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Happy Birthday MS Dhoni :- उनतालीस के हुए महेंद्र सिंह धोनी


उनतालीस के धोनी
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यों तो क्रिकेट मेरा पसंदीदा विषय है। तथापि मैंने अनेक अयाचित कारणों से इसपर लिखना समाप्त कर दिया है।
किंतु इस विषय “धोनी” पर लिखने के लिए अभी तक इतने लोगों ने आग्रह किया है कि अब उनको ना कहना, मेरे लिए संभव नहीं रह गया है। अतएव, अब इस मसले पर मैं अपनी बातें कहता हूँ।अव्वल तो ये समझना जरूरी है कि “धोनी” मात्र एक “बल्लेबाज” नहीं, मात्र एक “विकेटकीपर” नहीं, मात्र एक “कप्तान” या “पूर्व-कप्तान” ही नहीं। बल्कि वे तकरीबन बारह बरस की प्रतीक्षाओं का परिणाम हैं, जिसके अभाव-काल को भारतीय क्रिकेट ने जिया!
इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए, क्रिकेट में लगातार हुए बदलावों के दौर को समझना होगा। किस तरह टीम्स में “विकेटकीपर” का स्थान “विकेटकीपर-बल्लेबाज़” ने ले लिया, ये समझना होगा।
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ये दौर था, क्रिकेट का संक्रमण काल। नब्बे के दशक की शुरुआत, सन् इक्यानवे!
विश्व क्रिकेट ने पहली बार “एडम गिलक्रिस्ट” का तार्रुफ़ पाया। एक ऐसा लड़का, जो निश्चित तौर पर अब तक हुए क्रिकेटर्स में से नहीं था।
चूँकि वो जितना बेहतरीन “विकेटकीपर” था, उतना ही शानदार “बल्लेबाज” भी। हालांकि अभी वो ऑस्ट्रेलिया की नेशनल टीम और क्रिकेट अकादमी को ही रिप्रेजेंट कर रहा था। किन्तु क्रिकेट विश्व को ज्ञात था कि हो न हो, एक रोज़ ये ऑस्ट्रेलिया की इंटरनेशनल टीम का हिस्सा होगा। उनदिनों, विश्व क्रिकेट में एक परिपाटी चलती थी कि “विकेटकीपर” लोअर-मिडल ऑर्डर के ख़त्म हो जाने के बाद क्रीज पर आएंगे। एक तरह से देखा जाए तो “विकेटकीपर”, बैटिंग टीम के लिए व्यर्थ था। उसके कारण एक “बल्लेबाज” कम रह जाता था।
किन्तु “गिलक्रिस्ट” ने शेष विश्व के समक्ष दिखाया कि जिस “विकेटकीपर” को खिलाने के लिए आपकी टीम में एक “बल्लेबाज़” कम रह जाता है, उसका सबसे कारगर उपाय यही है कि स्वयं “विकेटकीपर” भी “बल्लेबाज” हो जाए!
बहरहाल, ऐसा भी नहीं है कि इस तरह की चीज़ें पहले नहीं सोची गईं! अवश्य सोची गईं।
सन् पिचासी के बाद तीन बार हुए “ऑस्ट्रल-एशिया कप” में से दो बार विजेता बने पकिस्तान ने उनदिनों “विकेटकीपिंग” को महत्त्व नहीं दिया था। वे एक ऐसे “बल्लेबाज” के साथ खेले, जिसे कामचलाऊ “विकेटकीपिंग” आती थी, जो तकरीबन दो सौ मैच में कुल छः बार “स्टाम्पिंग” कर सका!
किन्तु वो “बैट्समैन” अच्छा था। और इस तरह एक एक्स्ट्रा “बैट्समैन” के साथ पाकिस्तानी टीम एक ऐज लेकर खेलती थी।
Pic via: Getty Images
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ये तो हुई “विकेटकीपिंग” की बात!
इसके साथ ही आती है, उनदिनों वनडे में हुए ऐतिहासिक बदलाव की बात।
सन् इक्यानवे-बानवे का विश्वकप, सम्मिलित रूप से ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड में आयोजित हुआ। उस विश्वकप में टीम्स गईं तो थीं क्रिकेट खेलने किन्तु वहां से क्रिकेट स्ट्रेटजी सीख कर आईं।
उस समय न्यूजीलैंड के कप्तान “मार्टिन क्रो” हुआ करते थे। विश्व के ऑल टाइम क्लेवर स्किपर्स में शीर्ष स्थान की काबिलियत वाला खिलाड़ी। शुरूआती दस ओवर्स में विकेट बचाने के स्थान पर, ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करना इसी कप्तान की योजना रही।
और इस अभूतपूर्व योजना के कारण, सेमीफाइनल्स की लिस्ट में न्यूजीलैंड टॉप पर थी!
इस वर्ल्ड कप की समाप्ति के पश्चात्, “गिलक्रिस्ट” के ऑस्ट्रेलिया फर्स्ट क्लास क्रिकेट में उदय के पश्चात्, समूचे विश्व को टीम स्क्वाड में एक और “बल्लेबाज” की कमी ज़्यादा महसूस होने लगी थी।
और इस कमी को पूर्णता की ओर ले जाने में श्रीलंकन कप्तान “अर्जुन रणतुंगा” ने महती भूमिका अदा की। उन्होंने ही, वस्तुतः मार्टिन क्रो की योजना को “क्रो-साइट” (काकचेष्टा) से पकड़ा और श्रीलंकन टीम में एक स्पिनर बोलिंग ऑल राउंडर की तरह शामिल हुए “जयसूर्या” को ओपनिंग दे दी। और उनका साथ देने आते थे, अब तलक दसवें नंबर पर आते रहे विकेटकीपर “कालूविथरना”।
इन दोनों का एक कार्य था, शुरूआती दस ओवर में विपक्षी गेंदबाजों को जमकर कूटना, विकेट थ्रो करने के इंटेंशन से रिस्क लेकर खेलना। और इस साहसिक निर्णय ने छियानवे के विश्वकप में “जयसूर्या” को दो सौ इक्कीस रन और सात विकेट के साथ, "मैन ऑफ द टूर्नामेंट" का तमगा भी मिला!
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तो जनाब, अव्वल तो ऑस्ट्रेलियाई फर्स्ट क्लास में “गिलक्रिस्ट” का उदय, दूजा “मार्टिन क्रो” द्वारा सुझाई गई आकर्षक रणनीति के कार्यान्वन के लिए एक और “बल्लेबाज” के होने की आवश्यकता और तीजा “अर्जुन रणतुंगा” द्वारा विकेटकीपर का ओपनर बल्लेबाज की भांति सफल प्रयोग!
-- इन तीनों क्रांतिकारी घटनाओं ने “विकेटकीपर” शब्द को “विकेटकीपर-बल्लेबाज” में बदल दिया।
और तब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सन् छियानवे में “गिलक्रिस्ट” और सन् अठानावे में “मार्क बाउचर” का उदय हुआ। दोनों ही अपने अपने पूर्ववर्तियों ने कई गुना आगे थे, कई गुना!
फिर सन् दो हज़ार में श्रीलंका ने भी अपना "गिलक्रिस्ट" ढूंढ लिया : “कुमार संगकारा”।
सबसे आखिर में भारत और न्यूजीलैंड को अपने अपने "गिलक्रिस्ट" मिले, नई सदी की सन् चार में “मैकुलम” और “महेंद्र सिंह धोनी” ने पदार्पण किया।
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“धोनी” भारतीय क्रिकेट में “विकेटकीपर-बल्लेबाज” के सूखे के बीच इस तरह आए कि फिर टीम के साथ रच-बस गए। कदाचित् वे दुनिया ने उन खिलाडियों में से हैं, जिन्हें कभी अपने "परफॉरमेंस" को लेकर टीम से ड्राप नहीं होना पड़ा, यहाँ तक कि बाहर भी नहीं बैठना पड़ा।
“गिलक्रिस्ट”, “बाउचर”, “संगकारा”, “मैकुलम” और “धोनी” -- ये पांच नाम, पिछले दो दशक में “विकेटकीपिंग” के मायने बदलने वाले नाम हैं। इनके बिना क्रिकेट के उस रस की कल्पना नहीं की जा सकती थी, जिसे आपने हमने और सबने प्राप्त किया है।
किन्तु “धोनी” इनमें भी अलग हैं!
आमतौर पर, जब किसी “स्पिनर” की गेंद “विकेटकीपर” के ग्लव्स में आती है, तो “कीपर” उसकी गति और अपनी हथेली के क्लैश से क्रिएट होने वाले शॉक को मिनीमाइज़ करने के लिए, अपने हाथों को पीछे की ओर ले जाते हुए गेंद पकड़ता है।
इसमें कोई बहुत रॉकेट सांइस नहीं, सीधा सादा फिजिक्स का “लॉ ऑफ़ इनर्शिया” है, जड़त्व का नियम! तमाम “विकेटकीपर्स”, यहाँ तक कि ऊपर दिए पांच में से चार नाम भी, इसी "लॉ" पर अभ्यास करते रहे हैं!
ऐसी स्थिति में क्या होता है कि पहले बॉल ग्लव्स में आती है, हाथ पीछे जाते हैं। और “स्टम्पिंग” का चांस बनने पर हाथ पुनः आगे आते हैं और अपना काम पूरा करते हैं। इस आवागमन में कमसकम तीन सेकण्ड या दो सेकण्ड तो अवश्य लगते हैं।
“धोनी” की उपलब्धि ये है कि उन्होंने इन तीन सेकण्ड्स को समाप्त किया। उनका अभ्यास ये है कि ग्लव्स को आगे लाते हुए बॉल को पकड़ना, बॉल की गति को अपनी हथेली की गति से क्लैश करा कर शांत करना और वहीं से “स्टम्पिंग” कर देना।
वस्तुतः, आज विश्व की प्रमुख क्रिकेट अकादमी में होने वाली “विकेटकीपिंग” की ट्रेनिंग इसी टेक्निक पर दी जा रही है।
ये यश है “धोनी” का, जो न “गिलक्रिस्ट” को प्राप्त है और न ही “बाउचर”, “संगकारा” और “मैकुलम” को!
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किन्तु आज “धोनी” के साथ क्या हो रहा है?
आज “धोनी” आलोचना झेल रहे हैं। अपने क्रम को पूरी तरह फुलफिल करने के बाद भी, एक लोअर-मिडल बैट्समैन के औसत से काफी अच्छा औसत होने के बाद भी, वो आलोचना झेल रहे हैं।
कीर्तिमानों की बात तो मैंने की ही नहीं, न पूरे लेख में और न ही अब करने जा रहा हूँ। बस सिवाय इसके कि उन्होंने साढ़े तीन सौ एकदिवसीय मैच में दस हज़ार रन बनाए हैं।
और आप क्या आशाएं रखते हैं एक सिक्स नंबर बल्लेबाज से?
जहां “विराट कोहली” बहत्तर रन बनाने के लिए एक सौ छियालीस मिनट लेते हैं, वहीं “धोनी” छप्पन रन बनाने के लिए निन्यानवे मिनट।
फिर भी स्लो का टैग किसपर है? “धोनी” पर!
ये अंतहीन विमर्श है, किंतु फिर भी, यदि आपको लास्ट सेंचुरी के आखिरी में उठी “विकेटकीपर-स्टोरी” समझ आ गई, तो आप “धोनी” को अवश्य समझ पाएंगे।
वो केवल एक “बल्लेबाज” नहीं, मात्र एक “विकेटकीपर” नहीं, मात्र एक “कप्तान” या “पूर्व-कप्तान” ही नहीं। बल्कि वे तकरीबन बारह बरस की प्रतीक्षाओं का परिणाम हैं, जिसके अभाव-काल को भारतीय क्रिकेट ने जिया!
“धोनी” उन तमाम पौधों के बीज हैं, जो अपने सिर उठा चुके हैं, वे भविष्य में भारतीय “विकेटकीपिंग” लाइन अप को मजबूती देंगे!
अस्तु, उनतालीस बरस के युवा धोनी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ। इति। Writes: Yogi Anurag

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